Thursday, April 14, 2011

Spilling Spell by Chandra Shekhar Varma| Lulu Poetry

I tried hard!
heart kept on throbbing without any rhythm,
keeping the emotions close to itself:
Words kept quite ,
as the feelings perished unceremoniously:


The romance of the rains

failed to grow on
dreams,as they dissolved in the drops;
I craved and cried,but all in oblivion,
I let the fervour color everything else ,
but my vision;I concealed and contained
passions,hope,desires:
I would have kept you and your covet
deep down the cluster of thoughts,
giving the world an open canvas to portray
the wildest imaginations;
I did not want anyone to see me missing you
and yet ,the melody of the silence spoke
sad eyes were questioned
to no alternative answer!

Sunday, April 11, 2010

हस्ताक्षर: कहूँ या न कहूँ...

हस्ताक्षर: कहूँ या न कहूँ...

कहूँ या न कहूँ...

मेरी दीवानगी ने कुछ नयी अदाएं सीखी हैं,
बड़े ज़ाहिर तरीके से ये बातों को छुपाती है,

मैं अपने जिस्म में होती बगावत किस तरह झेलूं,
जुबां खामोश रहती है ख्वहिश तिलमिलाती है,

मेरी नींदों ने मेरी चाहतों के राज़ खोले हैं,
जो तू ख्वाबों में आती है तो पलकें मुस्कुराती हैं,

बड़ी नक्काशियां करती है मेरी ये कलम देखो,
की कागज़ पे ये लफ़्ज़ों से तेरी सूरत बनाती है

मैं अपनी शायरी में ज़िक्र तेरा करता हूँ क्यूँ हरदम,
तेरी मौजूदगी ही तो इसे काबिल बनाती है,

Wednesday, April 7, 2010

रोज़ सुबह की आँखों में इक नयी कहानी पढता हूँ,
मै सपनों का हाथ पकड़ कर समय की सीढ़ी चढ़ता हूँ

हवा की लट में फूल घूंध कर मौसम को महकाता हूँ
मै बारिश में रंग घोल कर आशाएं बरसाता हूँ
सागर की इन लहरों में बीते नयी हिलोरें भरता हूँ
मैं सूरज की किरणें अपने हाथों से चमकाता हूँ

मैं चमकीली धुप गला कर धरा के गहने गढता हूँ
मैं सपनो का हाथ पकड़ कर समय की सीढ़ी चढ़ता हूँ,

चलते चलते उम्मीदों को लगता है आघात कोई,
जब जीवन में हो जाती है अनहोनी सी बात कोई,
आशंका का गहरा तम जब नभ पर छा सा जाता है,
नींद से लड़ने आ जाती है लम्बी सी जब रात कोई,

तब प्रकाश का परचम ले कर अंधकार से लड़ता हूँ,
मै सपनो का हाथ पकड़ कर समय की सीढ़ी चढ़ता हूँ,

बीते पल की याद कभी और अगले पल की आस कभी,
ये सब छोड़ो और सोचो कि क्या है अपने पास अभी,
कभी निराशा के बादल घिर आयें सभी दिशाओं से
विचलित ना होने पाए इस मन का ये विश्वास कभी

वर्तमान के उन्नत पथ पर यूँ ही निरंतर बढ़ता हूँ,
मै सपनो का हाथ पकड़ कर समय की सीढ़ी चढ़ता हूँ,