Sunday, April 11, 2010

कहूँ या न कहूँ...

मेरी दीवानगी ने कुछ नयी अदाएं सीखी हैं,
बड़े ज़ाहिर तरीके से ये बातों को छुपाती है,

मैं अपने जिस्म में होती बगावत किस तरह झेलूं,
जुबां खामोश रहती है ख्वहिश तिलमिलाती है,

मेरी नींदों ने मेरी चाहतों के राज़ खोले हैं,
जो तू ख्वाबों में आती है तो पलकें मुस्कुराती हैं,

बड़ी नक्काशियां करती है मेरी ये कलम देखो,
की कागज़ पे ये लफ़्ज़ों से तेरी सूरत बनाती है

मैं अपनी शायरी में ज़िक्र तेरा करता हूँ क्यूँ हरदम,
तेरी मौजूदगी ही तो इसे काबिल बनाती है,

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