रोज़ सुबह की आँखों में इक नयी कहानी पढता हूँ,
मै सपनों का हाथ पकड़ कर समय की सीढ़ी चढ़ता हूँ
हवा की लट में फूल घूंध कर मौसम को महकाता हूँ
मै बारिश में रंग घोल कर आशाएं बरसाता हूँ
सागर की इन लहरों में बीते नयी हिलोरें भरता हूँ
मैं सूरज की किरणें अपने हाथों से चमकाता हूँ
मैं चमकीली धुप गला कर धरा के गहने गढता हूँ
मैं सपनो का हाथ पकड़ कर समय की सीढ़ी चढ़ता हूँ,
चलते चलते उम्मीदों को लगता है आघात कोई,
जब जीवन में हो जाती है अनहोनी सी बात कोई,
आशंका का गहरा तम जब नभ पर छा सा जाता है,
नींद से लड़ने आ जाती है लम्बी सी जब रात कोई,
तब प्रकाश का परचम ले कर अंधकार से लड़ता हूँ,
मै सपनो का हाथ पकड़ कर समय की सीढ़ी चढ़ता हूँ,
बीते पल की याद कभी और अगले पल की आस कभी,
ये सब छोड़ो और सोचो कि क्या है अपने पास अभी,
कभी निराशा के बादल घिर आयें सभी दिशाओं से
विचलित ना होने पाए इस मन का ये विश्वास कभी
वर्तमान के उन्नत पथ पर यूँ ही निरंतर बढ़ता हूँ,
मै सपनो का हाथ पकड़ कर समय की सीढ़ी चढ़ता हूँ,
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1 comment:
aapki yah kavita padhkar agyey kee kavtia yaad aa gai,
me kb kahta hoon jag meri durdhar gati ke anukool bane, me kab kahta hoon jeevan maru nandan kaanan ka phool bane, kaanta kathor hai teekha hai, isme uskii maryada hai, me kab kahta hoon vah ghatkar prantar ka ochha phool bane.........
pyari kavtia hai, zindgi se bhari hui,
......hamaari ichchha shaqti hi hamara maarg prashast karti hai, vah sath hai to koi musiibat bahut der tk nahi thahar sakti...
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